मनुष्य के दुख का सबसे बड़ा कारण बस ये एक चीज

दुख और सुख जीवन रूपी सफर के साथी हैं. जो समय-समय पर मनुष्य जीवन में आते-जाते रहते हैं लेकिन एक ऐसी चीज है जो मनुष्य के दुख का कारण बनती है। 

चाणक्य के अनुसार अगर इस पर काबू कर लिया तो खुशियां कभी आपसे मुंह नहीं मोड़ेगी। 

आइए जानते हैं मनुष्य जीवन में किस वजह से आते हैं दुख -

कर्म ही पूजा है अर्थात जैसे अच्छे कर्म करने वाला हर जगह सम्मान पाता है उसी प्रकार बुरे कर्म वाला सदा दुख की बागड़ से घिर रहता है। 

चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति के कर्म ही उसके सुख और दुख का कारण बनते हैं। मनुष्य को वर्तमान के साथ उसके पिछले जन्म के कर्म का फल भी मिलता है। 

चाणक्य कहते हैं कि दूसरों का भला नहीं कर सकते तो बुरा भी न करें। 

दुख-सुख स्थायी नहीं है लेकिन जो मनुष्य अधिकतर दुख और तकलीफों की छाया में घिरा रहता है ये उसके कर्मों का ही परिणाम रहता है। 

देर-सवेर कर्म का फल इसी जन्म में मिलता है। सुख का समय आते ही मनुष्य अपने दुख की घड़ी को भूल जाता है और फिर उसे छोटे-बड़े, बुरे-भले का अंतर समझ नहीं आता। 

इसलिए चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति अपने कर्मों से ही दुख को आमंत्रित करता है।