नौकरी-बिजनेस में सफल बनने के ये हैं चार मंत्र

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि सफलता प्राप्‍त करने का पहला मूलमंत्र है कभी भी असफलता से नहीं घबराना चाहिए।

जब कोई व्‍यक्ति कोई कार्य शुरू कर दे तो वह असफलता से घबराकर उसे कभी बीच में न छोड़े।

असफलता और सफलता जीवन के चक्र हैं। अगर ईमानदारी से अपना कार्य करेंगे तो सफलता जरूर मिलेगी।

चाणक्य नीति के अनुसार व्‍यक्ति को अवसर मिलने पर कभी चूकना नहीं चाहिए। जब भी मौका मिले उसे अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए इस्‍तेमाल करें।

अगर झिझक या आलस्‍य कर गए तो बाद में हाथ मलते रह जाएंगे। व्‍यक्ति को सैदव मौका मिलने पर आगे बढ़ने की कोशिश करना चाहिए।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि कई बार लोग ऑफिस में अपने बॉस से प्रश्‍न पूछने में संकोच करते हैं और वे गलतियां कर देते हैं। व्‍यक्ति को कभी अपने प्रश्‍नों का जवाब जानने में संकोच नहीं करना चाहिए।

संकोच करने वाला व्‍यक्ति कभी भी आगे नहीं बढ़ सकते हैं। क्‍योंकि संकोची लोगों को ज्ञान नहीं मिल पाता है और वे पिछड़ते चले जाते हैं।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्‍मन उसका क्रोध होता है। क्रोध व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति खत्‍म कर देता है और बना हुआ काम भी खराब कर देता है।

ऐसे लोग न तो ऑफिस में सफल होते हैं और न ही बिजनेस में। इसलिए व्‍यक्ति को हमेशा  क्रोध से हमेशा दूरी बनाए रखना चाहिए।