मित्र-पत्नी की वास्तविकता का कब चलता है पता

चाणक्य की नीतियां आज भी प्रासंगिक हैं। चाणक्य ने एक श्लोक में बताया है कि आखिर मित्र व पत्नी की वास्तविकता का पता कब चलता है।

चाणक्य कहते हैं कि काम लेने पर नौकर-चाकरों की, दुख आने पर बंधु-बांधवों की, कष्ट आने पर मित्र की और धन लाभ होने पर अपनी पत्नी की वास्तविकता का ज्ञान होता है।

चाणक्य कहते हैं कि जब सेवक को किसी कार्य पर नियुक्त किया जाएगा तभी पता चलेगा कि वह कितना योग्य है।

इसी प्रकार जब व्यक्ति किसी मुसीबत में फंस जाता है तो उस समय भाई-बंधु और रिश्तेदारों की परीक्षा होती है।

मित्र की पहचान भी विपत्ति के समय ही होती है। इसी प्रकार धनहीन होने पर पत्नी की वास्तविकता का पता चलता है कि उसका प्रेम धन के कारण था या वास्तविक।

किसी रोग से पीड़ित होने पर, दुख आने पर, अकाल पड़ने पर, शत्रु की ओर से संकट आने पर, राजसभा में, श्मशान अथवा किसी की मृत्यु के समय जो व्यक्ति साथ नहीं छोड़ता, वास्तव में वहीं सच्चा बंधु माना जाता है।

व्यक्ति के रोग शय्या पर पड़ने होने अथवा दुखी होने, अकाल पड़ने और शत्रु द्वारा किसी भी प्रकार का संकट पैदा, किसी मुकदमे आदि में फंस जाने और मरने पर जो व्यक्ति श्मशान घाट तक साथ देता है, वही सच्चा बधु या अपना होता है।

व्यक्ति के रोग शय्या पर पड़ने होने अथवा दुखी होने, अकाल पड़ने और शत्रु द्वारा किसी भी प्रकार का संकट पैदा, किसी मुकदमे आदि में फंस जाने और मरने पर जो व्यक्ति श्मशान घाट तक साथ देता है, वही सच्चा बधु या अपना होता है।

हमेशा यही देखा जाता है कि जो किसी की सहायता करता है, उसकी ही मदद मिलती है। जो समय पर किसी के काम नहीं आता उसका साथ कौन देगा?